Saturday, 27 October 2012

ट्विट्टर का सफ़र















नया नया दिखा था सोशल नेटवर्किंग का नज़ारा,
ऑरकुट, फेसबुक पर बीत रहा था समय सारा,
फिर कहीं से ट्विट्टर के बारे में पता चला,
मैंने सोचा, चलो देखा जाए ये क्या हैं नयी बला,

बनाया ट्विट्टर पर अकाउंट तो वहां नज़ारा ही और था,
सब कुछ ना कुछ लिखे जा रहे थे, जिस पर देता ना कोई गौर था,
समझ नहीं आ रहा था यहाँ लोगो को कैसे बनाया जाए फ्रेंड,
सब लगे हुए थे कुछ ना कुछ करने में ट्रेंड,

फिर धीरे धीरे समझ आया की यहाँ फ्रेंड्स नहीं फोल्लोवेर्स होते हैं,
जिनकी संख्या को लेकर दिन रात सभी रोते हैं,
फ्रेंड्स नामक चीज़ तो यहाँ मात्र भ्रान्ति हैं,
फोल्लोवर काउंट ही ला सकता क्रान्ति हैं,

तो मैंने भी शुरू किया यहाँ कुछ ना कुछ लिखना,
चाहता था मैं भी ट्विट्टर की भीड़ में दिखना,
पहले पहल तो बातें लिखी बड़े ज्ञान की,
एक भी बात ना छोड़ी किसी विद्वान् की,

फिर समझ आया की यहाँ ज्ञान की नहीं हैं ज्यादा क़दर,
सबको यहाँ चाहिए हास्य ट्वीट्स का ग़दर,
फिर मैंने भी अपने आप को हास्य की तरफ मोड़ा,
और इस कोशिश ने मुझे ना ज्ञान का और ना ही हास्य का छोड़ा,

पर उसी का असर हो सकता हैं की कुछ लोग मेरा भी पीछा करने लगे हैं,
ना जाने मेरी अंट शंट बातों को कैसे सहने लगे हैं,
पर अब यहाँ कभी कभी पक जाता हूँ,
मानसिक रूप से थक जाता हूँ,

कई बार तो मन में यहाँ से चले जाने का विचार भी आता हैं,
पर ट्विट्टर का मोह ही ऐसा हैं,
की एक बार जो यहाँ आ जाता हैं,
वो चाह कर भी वापस ना जा पाता हैं!