Friday, 17 May 2013

गर्मियों का प्रकोप














हो चुका है गर्मियों का आगमन,
अस्त व्यस्त हो चुका है जन जीवन,
सूर्य देवता के बढते ताप से लोग परेशान है,
और तापमान मापक का पारा छू रहा आसमान है,

सार्वजनिक यातायात साधनो मे होता गर्मीं का असली अहसास है,
बदबू के कारण दूभर हो जाता लेना श्वास है,
उस समय मन को अजीब अजीब सवाल सताते है,
कि लोग आखिर इतनी गर्मीं मे भी क्यों नही नहाते है,

घर पर भी कहां चैन मिल पाता है,
छत का पंखा भी आग ही बरसाता है,
अब तो पूरा शहर भी नर्क की उस कथित मानव भट्टी का अहसास दिलाता है,
जहां मनुष्य अपने पापो की सजा पाता है,

अब ये मौसम का चक्र तो किसी तरह झेलना है,.
मई तो लगभग झेल चुके है, जून और जूलाई और झेलना है,
इसीलिये काबू किजिये अपने मस्तिष्क का पारा,
और सामना किजिये इस मौसम का जैसे 'ये मौसम ना आयेगा दोबारा'


Image Courtesy: Google Images