
जैसे ही मैंने गणित की पुस्तिका खोली,
सारी चेतना हवा हो ली,
मन समाने लगा अवचेतन में,
कुछ न समझ आया, किस्मे क्या जोडू और क्या दू घटा,
बस उस पुस्तक को देना चाहता था नज़रों से हटा,
सारे अंक मानो मुझे चिढ़ा रहे थे,
मेरी विपदा को और भी बढ़ा रहे थे,
गुणा भाग के चिन्ह दे रहे थे दिमाग को झटका,
सोचा मैंने अजय यार ये तू कहा आ अटका?
हिसाब किताब तो तुझे आता ही था,
गिनतिया भी तू सही बताता ही था,
क्यों आ फ़सा इस 'X' के फ़ेर में,
Sin, Cos, Tan के अंधेर में,
छोड़ दे ये सब मोह माया हैं,
इस विषय से आख़िर किसका भला हो पाया हैं?
मैंने भी सुनी अपने मन की वाणी,
दूर रख दी वो पुस्तक पुरानी,
सोचा इस गणित से कभी पार न पाउँगा,
आज से सारा ध्यान सिर्फ ट्वीटइंग पर लगाऊंगा!!


