Sunday, 19 August 2012

"गणित का गड़बड़ झाला"














जैसे ही मैंने गणित की पुस्तिका खोली,
सारी चेतना हवा हो ली,
मन समाने लगा अवचेतन में,
सनसनी सी दौड़ गयी पूरे तन में,


कुछ न समझ आया, किस्मे क्या जोडू और क्या दू घटा,
बस उस पुस्तक को देना चाहता था नज़रों से हटा,
सारे अंक मानो मुझे चिढ़ा रहे थे,
मेरी विपदा को और भी बढ़ा रहे थे,


गुणा भाग के चिन्ह दे रहे थे दिमाग को झटका,
सोचा मैंने अजय यार ये तू कहा आ अटका?
हिसाब किताब तो तुझे आता ही था,
गिनतिया भी तू सही बताता ही था,


क्यों आ फ़सा इस 'X' के फ़ेर में,
Sin, Cos, Tan के अंधेर में,
छोड़ दे ये सब मोह माया हैं,
इस विषय से आख़िर किसका भला हो पाया हैं?


मैंने भी सुनी अपने मन की वाणी,
दूर रख दी वो पुस्तक पुरानी,
सोचा इस गणित से कभी पार न पाउँगा,
आज से सारा ध्यान सिर्फ ट्वीटइंग पर लगाऊंगा!!

Monday, 13 August 2012

"सोने की चिड़िया"










एक दिन आन पड़ा एक काम सरकारी दफ्तर में,
काँप उठा अन्दर तक थर थर मैं,
सोचा ये क्या बला गले आन पड़ी हैं,
सरकारी बाबुओ की फ़ौज मुह बाये खड़ी हैं,

पहुंचा दफ्तर में मैं एक अफसर के पास,
लगा कर उससे कुछ काम की आस,
वो बोला, घडी कर रही है लंच टाइम की टिक टिक,
नहीं कर सकता कुछ काम समय है विकट,

भोजनकाल के बाद तुम आना,
फिर हमसे कुछ उम्मीद लगाना,
खड़ा रहा फिर वहीं मैं बन कर के मूरत,
भोजनकाल के भी आधे घंटे बाद दिखी उनकी सूरत,

जैसे ही वो पहुंचे कुर्सी पर ले कर तशरीफ़,
मैं भी जा पहुँचा उनके समीप,
बोला, अब तो कुछ दया दृष्टि दिखाइए,
और इस काम को थोडा जल्दी निबटाइए,

वो बोले, सरकारी दफ्तर पहली बार हो आये?
यहाँ के नियम कानून तुम्हे किसी ने ना बताये?
बोले, काम कराने के लिए फाइल पर रखना पड़ता है वज़न,
वरना हमारा नहीं लगता किसी काम में मन,

मैं बोला, सरकार से नहीं लेते हो तनख्वाह?
वो बोले, उसमे आजतक किसका भला है हुआ?
भ्रष्टाचार तो हमारे देश की रीत है,
चुप चाप पैसे दे दो, इसी में तुम्हारी जीत है,

मैं बोला, इसी विचारधारा ने हमारे देश को तोड़ दिया है,
फिर से इसे अपंग बना कर छोड़ दिया है,
अरे इससे अच्छा तो तब था जब हम नहीं थे आज़ाद,
उस समय देश कहाँ था इतना बर्बाद?

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जाग जाइये,
इस देश को ईमानदारी से आगे बढाइये,
इसी से सारे काम हो जायेंगे बढ़िया,
और हमारा देश फिर से कहला सकेगा, "सोने की चिड़िया"

Wednesday, 8 August 2012

आज के बच्चे














अब क्या कहू आज के बच्चो के बारे में,
वो तो अब तोप हो गए है,
इस तकनीकी युग में,
टी.वी, विडियो, लैपटॉप हो गए है,

facebook के बिना तो इनकी बिलकुल ना पटती,
twitter के बिना इनकी रात ना है कटती,
सारे विचार पेश करते है ट्वीट्स के रूप में,
झुलस रहे है आज के बच्चे इन्टरनेट की धूप में,

लड़की भी आजकल facebook पर है पटाते,
फिर उसका असली फेस देखकर रातों ना सो पाते,
अगर कही सुलभ शौचालय में भी जाते है,
तो उसकी अपडेट भी आप four square पर पाते है,

मानता हूँ इन्टरनेट जरिया है अच्छा,
जिसे इस्तेमाल करता है आज का बच्चा बच्चा,
पर मेरी मानो तो सारा प्यार इन्टरनेट पर मत जताओ,
अपनी आँखें खोलो, और कुछ समय असली ज़िन्दगी में भी बिताओ!!

Saturday, 4 August 2012

बनना हैं कवि, तो चोरी नहीं














एक कवि ने लिखी कविता, सारा ध्यान लगाकर,
पात्र बनाये, दृश्य सजाये, शब्दों की छलके गागर,
कह कविता वो कवि हर्षाये, इठलाये,
देख कविता अपनी को मन ही मन मुस्काए,


फिर आता है एक सरफिरा बनना चाहे कवि,
शब्दों का भी ज्ञान नहीं था जिसको सही सही,
उस कवि की देख कविता वो मूरख हर्षाया,
सोचे की ये विचार क्यों मेरे मन ना आया,


फिर वो चुरा ले गया उस कविता को कह कर के अपना,
देखे फिर कवि बनने का वो सुहाना सपना,
पर उस मूरख की ये समझ ना आया,
कविता कहना एक कला हैं, ये उसको भेद ना पाया,


फिर आनंद ले वो प्रशंसा का, जो उसकी नहीं थी असल में,
जैसे कोई कीट लग जाए, किसी किसान की फसल में,
फिर एक मित्र उसकी खोले उसकी आँखें,
चोरी पकड़ी जाने पर फिर वो बगले झांके,


फिर आया उसको समझ, चोरी नहीं है सही,
विचार हो तो अपने हो, दुझो के नहीं,
तो अब उस मूरख ने हैं ये बात ठानी,
शब्द बुनेगा हमेशा अपने, अपनी ही कहानी!!