Thursday, 12 December 2013

प्रोफेशनल आशिक़



एक दिन सड़क से गुज़रते हुए एक शख्स पर नज़र पड़ी,
तक रहा था वो एक खिड़की की ओर, देख रहा था बार बार घड़ी,
लगता था किसी घटना के घटित होने के इंतज़ार में था वो खड़ा,
उसका परेशानी भरा चेहरा देख मैं ही उससे बोल पड़ा,


क्यों भाई? क्यों इतने परेशान दिखते हो?
ये घड़ी की तरफ घड़ी घड़ी देख कर खिड़की को क्या तकते हो?


वो बोला, मैं प्रोफेशनल आशिक़ हूँ,
लड़की पटाने के सभी दाव पेंचो से वाकिफ़ हूँ,
खड़ा हूँ यहाँ एक नयी लड़की को पटाने के चक्कर में,
इस क्षेत्र में सबसे उत्तम हूँ मैं, कोई नहीं हैं टक्कर में,


मैं चुटकी लेते हुए बोला उससे,
लड़की पटाना भी हैं एक प्रोफेशन?
इतने ज्ञानी हैं अगर आप,
तो हमें भी दो कुछ लेसन,


तो वो बोला, लड़की पटाने में लगते हैं तीन ‘ध’,
जो हैं – धन, धैर्य ओर ध्यान,
ये तीनो ही वो गुण है,
जो बना सकते हैं तुम्हे महान,


‘धन’ लगता हैं मारने में टशन,
फॉलो करने में लेटेस्ट फैशन,
‘धैर्य’ लगता हैं लड़की के इंतज़ार में,
उसका पीछा करने घर तक, कॉलेज और बाज़ार में,
और ‘ध्यान’ रखना पड़ता हैं की कहीं देख ना ले उसके भाई,
वरना हो जायेगी ज़ोरदार पिटाई,


तो मैं उससे बोला, मुझमे नहीं हैं इनमे से कोई भी गुण,
ना ही धन, ना धैर्य ना ध्यान,
बस तू अपने पास ही रख अपना ये ख़तरनाक ज्ञान,


इतना ख़तरा उठाना नहीं हैं सही,
अगर लड़की के परिचितों ने देख लिया कहीं,
तो इतना मारेंगे की हड्डियाँ अपने स्थान से हट जायेगी,
मैं जा रहा हूँ पढने, लड़की जिस दिन पटनी होगी पट जायेगी!

Image Courtesy: Google Images

Friday, 17 May 2013

गर्मियों का प्रकोप














हो चुका है गर्मियों का आगमन,
अस्त व्यस्त हो चुका है जन जीवन,
सूर्य देवता के बढते ताप से लोग परेशान है,
और तापमान मापक का पारा छू रहा आसमान है,

सार्वजनिक यातायात साधनो मे होता गर्मीं का असली अहसास है,
बदबू के कारण दूभर हो जाता लेना श्वास है,
उस समय मन को अजीब अजीब सवाल सताते है,
कि लोग आखिर इतनी गर्मीं मे भी क्यों नही नहाते है,

घर पर भी कहां चैन मिल पाता है,
छत का पंखा भी आग ही बरसाता है,
अब तो पूरा शहर भी नर्क की उस कथित मानव भट्टी का अहसास दिलाता है,
जहां मनुष्य अपने पापो की सजा पाता है,

अब ये मौसम का चक्र तो किसी तरह झेलना है,.
मई तो लगभग झेल चुके है, जून और जूलाई और झेलना है,
इसीलिये काबू किजिये अपने मस्तिष्क का पारा,
और सामना किजिये इस मौसम का जैसे 'ये मौसम ना आयेगा दोबारा'


Image Courtesy: Google Images

Monday, 31 December 2012

"सर्दियों का स्नान"
















सर्दियाँ आ गयी हैं,
गिर गया हैं तापमान,
बाकी चीज़ें तो ठीक हैं,
पर मुश्किल हो गया हैं स्नान,


सर्दियों की धुंध वाली सुबह,
दिल को डराती हैं,
नहाने के विचार मात्र से ही,
रूह सिहर जाती हैं,


बड़ी दुविधा में रहता हूँ मैं आजकल,
क्योंकि गरम पानी से नहाने में जाती मेरी शान हैं,
और ठन्डे पानी से नहाना भी तो आत्महत्या के समान हैं,


इसीलिए आजकल सूर्य देव के दर्शन का रहता हैं इंतज़ार,
सूर्य की किरणे दिखने पर ही किया जाता हैं नहाने पर विचार,
इसीलिए जिस दिन सूर्य के दर्शन नहीं हैं होते,
उस दिन केवल हम हाथ मुह हैं धोते,


आपसे भी मेरी यही विनती हैं,
सिर्फ नहाने मात्र से नहीं होनी सभ्य लोगो में आपकी गिनती हैं,
इसीलिए सभी स्तीथियो का ले भलि भाँति संज्ञान,
और कुछ दिन छोड़ छोड़ करें सर्दियों में स्नान!!



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Wednesday, 14 November 2012

"भ्रष्टाचार"














कुछ दिनों से सब जगह भ्रष्टाचार के बारे में सुन रहा था,
आखिर ये हैं क्या बला, कोरी कल्पनाए बुन रहा था,
पहले तो लगा कि ये कोई नए किस्म का अचार हैं,
जिसका नया नया शुरू हुआ भारत में व्यापार हैं,

पर फिर पता चला की कोई हुआ हैं टू जी घोटाला,
जिसमे था भ्रष्टाचार का बोलबाला,
फिर कामनवेल्थ, कोल् गेट और हुए कई नए नए घोटाले युक्त काम,
इन सभी में फिर से आया भ्रष्टाचार का नाम,

अब तो मेरी जिज्ञासा और अधिक जाग चुकी थी,
अब सच्चाई थी जाननी मुझे, कल्पनाए सारी भाग चुकी थी,
तो लेकर अपने इस सवाल के जवाब की आस,
मैं जा पहुंचा एक नेता जी के पास,
बोला, नेता जी, इस सवाल के जवाब के लिए कई जगह मैंने धक्के खा लिए,
अब आप ही इस विषय पर थोड़ा प्रकाश डालिए,

नेता जी बोले, सरल शब्दों में कहूँ तो भ्रष्टाचार राजनीति का शिष्टाचार हैं,
एक नियमावली हैं जिसके आधार पर चलता अपना व्यापार हैं,
जो पैसा जनता के हित्त के लिए हमें मिलता हैं,
अपने घर का खर्चा भी उसी से चलता हैं,

अब मेरी समझ में पूरी तरह आ चुका था भ्रष्टाचार का खेल,
समझ चुका था ये नेता लोग रहे हैं अपना ही पैसा पेल
पर समय कहाँ था की करूँ भ्रष्टाचारियों से दो-दो हाथ,
तो मैं भी शामिल हो गया उस भीड़ में, जो कहती थी, "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम हैं तुम्हारे साथ"

Friday, 9 November 2012

रिसर्च: ट्विट्टर के कीड़े



















"आज के युग में वैज्ञानिको ने कीट पतंगों के साथ साथ एक बिलकुल नए कीड़े की खोज की हैं! इनका सम्बन्ध ट्विट्टर के साथ हैं अतः इन्हें ट्विट्टर के कीड़े कहा जाता हैं!"

प्राप्ति स्थान:- यह कीड़े प्राय गर्मियों में प्रकृति की शांत गोद में, बागों में, पेड़ों की छांया में, घर की छतो पर तथा सर्दियों में बंद घरों के कोनो में ट्वीट करते हुए पाए जाते हैं! ये कीड़े पूरी रात जागते हैं!

उत्पत्ति विधि:- इन्टरनेट तथा सोशल नेटवर्किंग नामक उत्प्रेरको के साथ तीव्र ट्वीट क्रिया करने पर यह कीड़े प्राप्त होते हैं!

                       इन्टरनेट + सोशल नेटवर्किंग + ट्वीट क्रिया ------> ट्विट्टर के कीड़े


भौतिक गुण:- इनका रंग साधारणतया पीला, आँखें अन्दर को धंसी हुई, छुपी तथा स्वभाव चिंताजनक पाया जाता हैं!

रासायनिक गुण:- यदि इन ट्विट्टर के कीड़ों को अधिक वायुमंडलीय दबाव पर लगभग 5 ग्राम हंसी मजाक के साथ ट्रोल किया जाए तो एक विशेष प्रकार के चिडचिडेपन की उत्पत्ति होती हैं!

                      ट्विट्टर के कीड़े + 5 ग्राम हंसी मजाक के साथ ट्रोल + वायुमंडलीय दबाव ------> चिडचिडापन


पहचान:- आँखें हमेशा मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन पर चिपकी हुई, कुछ फैशन से बिलकुल दूर और कुछ उससे भरपूर, हर समय राजनीति, फिल्मों या खेल की बातें करना, समाज के निकट होते हुए भी ये समाज से अपरिचित होते हैं!


नोट: "ये रचना मेरे द्वारा कुछ वर्षो पहले एक पत्रिका में पढ़ी गयी रचना से प्रेरित हैं!"

Saturday, 27 October 2012

ट्विट्टर का सफ़र















नया नया दिखा था सोशल नेटवर्किंग का नज़ारा,
ऑरकुट, फेसबुक पर बीत रहा था समय सारा,
फिर कहीं से ट्विट्टर के बारे में पता चला,
मैंने सोचा, चलो देखा जाए ये क्या हैं नयी बला,

बनाया ट्विट्टर पर अकाउंट तो वहां नज़ारा ही और था,
सब कुछ ना कुछ लिखे जा रहे थे, जिस पर देता ना कोई गौर था,
समझ नहीं आ रहा था यहाँ लोगो को कैसे बनाया जाए फ्रेंड,
सब लगे हुए थे कुछ ना कुछ करने में ट्रेंड,

फिर धीरे धीरे समझ आया की यहाँ फ्रेंड्स नहीं फोल्लोवेर्स होते हैं,
जिनकी संख्या को लेकर दिन रात सभी रोते हैं,
फ्रेंड्स नामक चीज़ तो यहाँ मात्र भ्रान्ति हैं,
फोल्लोवर काउंट ही ला सकता क्रान्ति हैं,

तो मैंने भी शुरू किया यहाँ कुछ ना कुछ लिखना,
चाहता था मैं भी ट्विट्टर की भीड़ में दिखना,
पहले पहल तो बातें लिखी बड़े ज्ञान की,
एक भी बात ना छोड़ी किसी विद्वान् की,

फिर समझ आया की यहाँ ज्ञान की नहीं हैं ज्यादा क़दर,
सबको यहाँ चाहिए हास्य ट्वीट्स का ग़दर,
फिर मैंने भी अपने आप को हास्य की तरफ मोड़ा,
और इस कोशिश ने मुझे ना ज्ञान का और ना ही हास्य का छोड़ा,

पर उसी का असर हो सकता हैं की कुछ लोग मेरा भी पीछा करने लगे हैं,
ना जाने मेरी अंट शंट बातों को कैसे सहने लगे हैं,
पर अब यहाँ कभी कभी पक जाता हूँ,
मानसिक रूप से थक जाता हूँ,

कई बार तो मन में यहाँ से चले जाने का विचार भी आता हैं,
पर ट्विट्टर का मोह ही ऐसा हैं,
की एक बार जो यहाँ आ जाता हैं,
वो चाह कर भी वापस ना जा पाता हैं!

Monday, 10 September 2012

ज्योतिष का जाल














एक हमारे मित्र हैं चौबे जी,
कुछ दिनों से जी रहे थे बड़े बुरे हाल में,
और कुछ उनकी समझ ना आया,
तो जा फंसे ज्योतिष के जाल में,


जाकर ज्योतिष से बोले, पंडित जी अब मैं थक गया हूँ,
इस दुखी जीवन से पक गया हूँ,
मुझे बताइए मेरा हाल इतना क्यों ख़राब हैं?
पिछले जन्म का तो नहीं कोई श्राप हैं?


पंडित जी बोले, ओह हो हो! तुम्हारा शनि तो बड़ा ही उच्च हैं,
बुद्ध, शुक्र की दशा बड़ी ही तुच्छ हैं,
राहू, केतु जा बैठे हैं आठवे घर में,
चन्द्रमा भी पहुच गया हैं पांचवे घर में,


फिर पंडित जी बोले, तेरी दशा तो बड़ी दुष्प्रभावी हैं,
इसमें तेरा सब कुछ खो सकता हैं,
लेकिन अगर तू पांच हज़ार रूपये दक्षिणा दे दे,
तो इसका कुछ उपाय ज़रूर हो सकता हैं,


इस पर चौबे जी झन्ना गए,
पंडित जी के ऊपर भन्ना गए,
बोले, शनि मेरे बेटे का नाम है वो कहा से उच्च हैं?
बुद्ध, शुक्र की दशा से मुझे क्या लेना कुछ हैं?


अरे ओ पंडित बेवक़ूफ़ ना बना, आठवे घर में तो शर्मा रहता हैं,
राहू और केतु क्या उसके किरायेदार हैं जो उन्हें वो सहता हैं?
और पंडित मैं इतना भी नहीं हूँ अनजान,
मैं जानता हूँ चन्द्रमा का निवास स्थान हैं आसमान,


अब अपनी दशा को तो लूँगा मैं खुद सुधार,
पर तेरा ना चलने दूंगा ये पाखण्ड का व्यापार,
ये कहते ही चौबे जी ने उसके सारे केश हिला दिए,
और मारते मारते उसके भूत, भविष्य और वर्त्तमान सब भुला दिए!!