Monday, 31 December 2012

"सर्दियों का स्नान"
















सर्दियाँ आ गयी हैं,
गिर गया हैं तापमान,
बाकी चीज़ें तो ठीक हैं,
पर मुश्किल हो गया हैं स्नान,


सर्दियों की धुंध वाली सुबह,
दिल को डराती हैं,
नहाने के विचार मात्र से ही,
रूह सिहर जाती हैं,


बड़ी दुविधा में रहता हूँ मैं आजकल,
क्योंकि गरम पानी से नहाने में जाती मेरी शान हैं,
और ठन्डे पानी से नहाना भी तो आत्महत्या के समान हैं,


इसीलिए आजकल सूर्य देव के दर्शन का रहता हैं इंतज़ार,
सूर्य की किरणे दिखने पर ही किया जाता हैं नहाने पर विचार,
इसीलिए जिस दिन सूर्य के दर्शन नहीं हैं होते,
उस दिन केवल हम हाथ मुह हैं धोते,


आपसे भी मेरी यही विनती हैं,
सिर्फ नहाने मात्र से नहीं होनी सभ्य लोगो में आपकी गिनती हैं,
इसीलिए सभी स्तीथियो का ले भलि भाँति संज्ञान,
और कुछ दिन छोड़ छोड़ करें सर्दियों में स्नान!!



Image Courtesy - Google Images

Wednesday, 14 November 2012

"भ्रष्टाचार"














कुछ दिनों से सब जगह भ्रष्टाचार के बारे में सुन रहा था,
आखिर ये हैं क्या बला, कोरी कल्पनाए बुन रहा था,
पहले तो लगा कि ये कोई नए किस्म का अचार हैं,
जिसका नया नया शुरू हुआ भारत में व्यापार हैं,

पर फिर पता चला की कोई हुआ हैं टू जी घोटाला,
जिसमे था भ्रष्टाचार का बोलबाला,
फिर कामनवेल्थ, कोल् गेट और हुए कई नए नए घोटाले युक्त काम,
इन सभी में फिर से आया भ्रष्टाचार का नाम,

अब तो मेरी जिज्ञासा और अधिक जाग चुकी थी,
अब सच्चाई थी जाननी मुझे, कल्पनाए सारी भाग चुकी थी,
तो लेकर अपने इस सवाल के जवाब की आस,
मैं जा पहुंचा एक नेता जी के पास,
बोला, नेता जी, इस सवाल के जवाब के लिए कई जगह मैंने धक्के खा लिए,
अब आप ही इस विषय पर थोड़ा प्रकाश डालिए,

नेता जी बोले, सरल शब्दों में कहूँ तो भ्रष्टाचार राजनीति का शिष्टाचार हैं,
एक नियमावली हैं जिसके आधार पर चलता अपना व्यापार हैं,
जो पैसा जनता के हित्त के लिए हमें मिलता हैं,
अपने घर का खर्चा भी उसी से चलता हैं,

अब मेरी समझ में पूरी तरह आ चुका था भ्रष्टाचार का खेल,
समझ चुका था ये नेता लोग रहे हैं अपना ही पैसा पेल
पर समय कहाँ था की करूँ भ्रष्टाचारियों से दो-दो हाथ,
तो मैं भी शामिल हो गया उस भीड़ में, जो कहती थी, "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम हैं तुम्हारे साथ"

Friday, 9 November 2012

रिसर्च: ट्विट्टर के कीड़े



















"आज के युग में वैज्ञानिको ने कीट पतंगों के साथ साथ एक बिलकुल नए कीड़े की खोज की हैं! इनका सम्बन्ध ट्विट्टर के साथ हैं अतः इन्हें ट्विट्टर के कीड़े कहा जाता हैं!"

प्राप्ति स्थान:- यह कीड़े प्राय गर्मियों में प्रकृति की शांत गोद में, बागों में, पेड़ों की छांया में, घर की छतो पर तथा सर्दियों में बंद घरों के कोनो में ट्वीट करते हुए पाए जाते हैं! ये कीड़े पूरी रात जागते हैं!

उत्पत्ति विधि:- इन्टरनेट तथा सोशल नेटवर्किंग नामक उत्प्रेरको के साथ तीव्र ट्वीट क्रिया करने पर यह कीड़े प्राप्त होते हैं!

                       इन्टरनेट + सोशल नेटवर्किंग + ट्वीट क्रिया ------> ट्विट्टर के कीड़े


भौतिक गुण:- इनका रंग साधारणतया पीला, आँखें अन्दर को धंसी हुई, छुपी तथा स्वभाव चिंताजनक पाया जाता हैं!

रासायनिक गुण:- यदि इन ट्विट्टर के कीड़ों को अधिक वायुमंडलीय दबाव पर लगभग 5 ग्राम हंसी मजाक के साथ ट्रोल किया जाए तो एक विशेष प्रकार के चिडचिडेपन की उत्पत्ति होती हैं!

                      ट्विट्टर के कीड़े + 5 ग्राम हंसी मजाक के साथ ट्रोल + वायुमंडलीय दबाव ------> चिडचिडापन


पहचान:- आँखें हमेशा मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन पर चिपकी हुई, कुछ फैशन से बिलकुल दूर और कुछ उससे भरपूर, हर समय राजनीति, फिल्मों या खेल की बातें करना, समाज के निकट होते हुए भी ये समाज से अपरिचित होते हैं!


नोट: "ये रचना मेरे द्वारा कुछ वर्षो पहले एक पत्रिका में पढ़ी गयी रचना से प्रेरित हैं!"

Saturday, 27 October 2012

ट्विट्टर का सफ़र















नया नया दिखा था सोशल नेटवर्किंग का नज़ारा,
ऑरकुट, फेसबुक पर बीत रहा था समय सारा,
फिर कहीं से ट्विट्टर के बारे में पता चला,
मैंने सोचा, चलो देखा जाए ये क्या हैं नयी बला,

बनाया ट्विट्टर पर अकाउंट तो वहां नज़ारा ही और था,
सब कुछ ना कुछ लिखे जा रहे थे, जिस पर देता ना कोई गौर था,
समझ नहीं आ रहा था यहाँ लोगो को कैसे बनाया जाए फ्रेंड,
सब लगे हुए थे कुछ ना कुछ करने में ट्रेंड,

फिर धीरे धीरे समझ आया की यहाँ फ्रेंड्स नहीं फोल्लोवेर्स होते हैं,
जिनकी संख्या को लेकर दिन रात सभी रोते हैं,
फ्रेंड्स नामक चीज़ तो यहाँ मात्र भ्रान्ति हैं,
फोल्लोवर काउंट ही ला सकता क्रान्ति हैं,

तो मैंने भी शुरू किया यहाँ कुछ ना कुछ लिखना,
चाहता था मैं भी ट्विट्टर की भीड़ में दिखना,
पहले पहल तो बातें लिखी बड़े ज्ञान की,
एक भी बात ना छोड़ी किसी विद्वान् की,

फिर समझ आया की यहाँ ज्ञान की नहीं हैं ज्यादा क़दर,
सबको यहाँ चाहिए हास्य ट्वीट्स का ग़दर,
फिर मैंने भी अपने आप को हास्य की तरफ मोड़ा,
और इस कोशिश ने मुझे ना ज्ञान का और ना ही हास्य का छोड़ा,

पर उसी का असर हो सकता हैं की कुछ लोग मेरा भी पीछा करने लगे हैं,
ना जाने मेरी अंट शंट बातों को कैसे सहने लगे हैं,
पर अब यहाँ कभी कभी पक जाता हूँ,
मानसिक रूप से थक जाता हूँ,

कई बार तो मन में यहाँ से चले जाने का विचार भी आता हैं,
पर ट्विट्टर का मोह ही ऐसा हैं,
की एक बार जो यहाँ आ जाता हैं,
वो चाह कर भी वापस ना जा पाता हैं!

Monday, 10 September 2012

ज्योतिष का जाल














एक हमारे मित्र हैं चौबे जी,
कुछ दिनों से जी रहे थे बड़े बुरे हाल में,
और कुछ उनकी समझ ना आया,
तो जा फंसे ज्योतिष के जाल में,


जाकर ज्योतिष से बोले, पंडित जी अब मैं थक गया हूँ,
इस दुखी जीवन से पक गया हूँ,
मुझे बताइए मेरा हाल इतना क्यों ख़राब हैं?
पिछले जन्म का तो नहीं कोई श्राप हैं?


पंडित जी बोले, ओह हो हो! तुम्हारा शनि तो बड़ा ही उच्च हैं,
बुद्ध, शुक्र की दशा बड़ी ही तुच्छ हैं,
राहू, केतु जा बैठे हैं आठवे घर में,
चन्द्रमा भी पहुच गया हैं पांचवे घर में,


फिर पंडित जी बोले, तेरी दशा तो बड़ी दुष्प्रभावी हैं,
इसमें तेरा सब कुछ खो सकता हैं,
लेकिन अगर तू पांच हज़ार रूपये दक्षिणा दे दे,
तो इसका कुछ उपाय ज़रूर हो सकता हैं,


इस पर चौबे जी झन्ना गए,
पंडित जी के ऊपर भन्ना गए,
बोले, शनि मेरे बेटे का नाम है वो कहा से उच्च हैं?
बुद्ध, शुक्र की दशा से मुझे क्या लेना कुछ हैं?


अरे ओ पंडित बेवक़ूफ़ ना बना, आठवे घर में तो शर्मा रहता हैं,
राहू और केतु क्या उसके किरायेदार हैं जो उन्हें वो सहता हैं?
और पंडित मैं इतना भी नहीं हूँ अनजान,
मैं जानता हूँ चन्द्रमा का निवास स्थान हैं आसमान,


अब अपनी दशा को तो लूँगा मैं खुद सुधार,
पर तेरा ना चलने दूंगा ये पाखण्ड का व्यापार,
ये कहते ही चौबे जी ने उसके सारे केश हिला दिए,
और मारते मारते उसके भूत, भविष्य और वर्त्तमान सब भुला दिए!!

Sunday, 19 August 2012

"गणित का गड़बड़ झाला"














जैसे ही मैंने गणित की पुस्तिका खोली,
सारी चेतना हवा हो ली,
मन समाने लगा अवचेतन में,
सनसनी सी दौड़ गयी पूरे तन में,


कुछ न समझ आया, किस्मे क्या जोडू और क्या दू घटा,
बस उस पुस्तक को देना चाहता था नज़रों से हटा,
सारे अंक मानो मुझे चिढ़ा रहे थे,
मेरी विपदा को और भी बढ़ा रहे थे,


गुणा भाग के चिन्ह दे रहे थे दिमाग को झटका,
सोचा मैंने अजय यार ये तू कहा आ अटका?
हिसाब किताब तो तुझे आता ही था,
गिनतिया भी तू सही बताता ही था,


क्यों आ फ़सा इस 'X' के फ़ेर में,
Sin, Cos, Tan के अंधेर में,
छोड़ दे ये सब मोह माया हैं,
इस विषय से आख़िर किसका भला हो पाया हैं?


मैंने भी सुनी अपने मन की वाणी,
दूर रख दी वो पुस्तक पुरानी,
सोचा इस गणित से कभी पार न पाउँगा,
आज से सारा ध्यान सिर्फ ट्वीटइंग पर लगाऊंगा!!

Monday, 13 August 2012

"सोने की चिड़िया"










एक दिन आन पड़ा एक काम सरकारी दफ्तर में,
काँप उठा अन्दर तक थर थर मैं,
सोचा ये क्या बला गले आन पड़ी हैं,
सरकारी बाबुओ की फ़ौज मुह बाये खड़ी हैं,

पहुंचा दफ्तर में मैं एक अफसर के पास,
लगा कर उससे कुछ काम की आस,
वो बोला, घडी कर रही है लंच टाइम की टिक टिक,
नहीं कर सकता कुछ काम समय है विकट,

भोजनकाल के बाद तुम आना,
फिर हमसे कुछ उम्मीद लगाना,
खड़ा रहा फिर वहीं मैं बन कर के मूरत,
भोजनकाल के भी आधे घंटे बाद दिखी उनकी सूरत,

जैसे ही वो पहुंचे कुर्सी पर ले कर तशरीफ़,
मैं भी जा पहुँचा उनके समीप,
बोला, अब तो कुछ दया दृष्टि दिखाइए,
और इस काम को थोडा जल्दी निबटाइए,

वो बोले, सरकारी दफ्तर पहली बार हो आये?
यहाँ के नियम कानून तुम्हे किसी ने ना बताये?
बोले, काम कराने के लिए फाइल पर रखना पड़ता है वज़न,
वरना हमारा नहीं लगता किसी काम में मन,

मैं बोला, सरकार से नहीं लेते हो तनख्वाह?
वो बोले, उसमे आजतक किसका भला है हुआ?
भ्रष्टाचार तो हमारे देश की रीत है,
चुप चाप पैसे दे दो, इसी में तुम्हारी जीत है,

मैं बोला, इसी विचारधारा ने हमारे देश को तोड़ दिया है,
फिर से इसे अपंग बना कर छोड़ दिया है,
अरे इससे अच्छा तो तब था जब हम नहीं थे आज़ाद,
उस समय देश कहाँ था इतना बर्बाद?

अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जाग जाइये,
इस देश को ईमानदारी से आगे बढाइये,
इसी से सारे काम हो जायेंगे बढ़िया,
और हमारा देश फिर से कहला सकेगा, "सोने की चिड़िया"

Wednesday, 8 August 2012

आज के बच्चे














अब क्या कहू आज के बच्चो के बारे में,
वो तो अब तोप हो गए है,
इस तकनीकी युग में,
टी.वी, विडियो, लैपटॉप हो गए है,

facebook के बिना तो इनकी बिलकुल ना पटती,
twitter के बिना इनकी रात ना है कटती,
सारे विचार पेश करते है ट्वीट्स के रूप में,
झुलस रहे है आज के बच्चे इन्टरनेट की धूप में,

लड़की भी आजकल facebook पर है पटाते,
फिर उसका असली फेस देखकर रातों ना सो पाते,
अगर कही सुलभ शौचालय में भी जाते है,
तो उसकी अपडेट भी आप four square पर पाते है,

मानता हूँ इन्टरनेट जरिया है अच्छा,
जिसे इस्तेमाल करता है आज का बच्चा बच्चा,
पर मेरी मानो तो सारा प्यार इन्टरनेट पर मत जताओ,
अपनी आँखें खोलो, और कुछ समय असली ज़िन्दगी में भी बिताओ!!

Saturday, 4 August 2012

बनना हैं कवि, तो चोरी नहीं














एक कवि ने लिखी कविता, सारा ध्यान लगाकर,
पात्र बनाये, दृश्य सजाये, शब्दों की छलके गागर,
कह कविता वो कवि हर्षाये, इठलाये,
देख कविता अपनी को मन ही मन मुस्काए,


फिर आता है एक सरफिरा बनना चाहे कवि,
शब्दों का भी ज्ञान नहीं था जिसको सही सही,
उस कवि की देख कविता वो मूरख हर्षाया,
सोचे की ये विचार क्यों मेरे मन ना आया,


फिर वो चुरा ले गया उस कविता को कह कर के अपना,
देखे फिर कवि बनने का वो सुहाना सपना,
पर उस मूरख की ये समझ ना आया,
कविता कहना एक कला हैं, ये उसको भेद ना पाया,


फिर आनंद ले वो प्रशंसा का, जो उसकी नहीं थी असल में,
जैसे कोई कीट लग जाए, किसी किसान की फसल में,
फिर एक मित्र उसकी खोले उसकी आँखें,
चोरी पकड़ी जाने पर फिर वो बगले झांके,


फिर आया उसको समझ, चोरी नहीं है सही,
विचार हो तो अपने हो, दुझो के नहीं,
तो अब उस मूरख ने हैं ये बात ठानी,
शब्द बुनेगा हमेशा अपने, अपनी ही कहानी!!

Monday, 30 July 2012

"जहां ना पहुंचे रवि, वहाँ पहुचे कवि"















जा रहा था वो कवि अपनी ही धुन में,
अपनी कविताओं की उधेड़ बुन में,
ना रहा था होश कहाँ उसके पाँव हैं,
मजधार में पहुच चुकी उस की नाव हैं,


तभी उसका पैर पड़ा खुले गटर पर,
जा पहुंचा वो कवि उसके तल में,
स्याह अँधेरे ने था उसको घेर लिया,
वहां से निकलना था ना उसके बल में,



अब उसने सोचा की कहाँ मैं हूँ फँस गया,
अपनी कल्पनाओ में ऐसा क्या था धस गया,
ना रहा था होश उसे, कहाँ था वो जा रहा,
अब वहां पड़ा पड़ा, था वोह कराह रहा,



तभी उसने देखा की सूरज की रोशनी,
वहां नहीं पहुँच पा रही थी कहीं भी,
उसे देखकर फिर वो हैं ये सोचता,
ऐ कवि तू वहां आ पहुंचा जहाँ रवि न पहुंचता!!