काँप उठा अन्दर तक थर थर मैं,
सोचा ये क्या बला गले आन पड़ी हैं,
सरकारी बाबुओ की फ़ौज मुह बाये खड़ी हैं,
पहुंचा दफ्तर में मैं एक अफसर के पास,
लगा कर उससे कुछ काम की आस,
वो बोला, घडी कर रही है लंच टाइम की टिक टिक,
नहीं कर सकता कुछ काम समय है विकट,
भोजनकाल के बाद तुम आना,
फिर हमसे कुछ उम्मीद लगाना,
खड़ा रहा फिर वहीं मैं बन कर के मूरत,
भोजनकाल के भी आधे घंटे बाद दिखी उनकी सूरत,
जैसे ही वो पहुंचे कुर्सी पर ले कर तशरीफ़,
मैं भी जा पहुँचा उनके समीप,
बोला, अब तो कुछ दया दृष्टि दिखाइए,
और इस काम को थोडा जल्दी निबटाइए,
वो बोले, सरकारी दफ्तर पहली बार हो आये?
यहाँ के नियम कानून तुम्हे किसी ने ना बताये?
बोले, काम कराने के लिए फाइल पर रखना पड़ता है वज़न,
वरना हमारा नहीं लगता किसी काम में मन,
मैं बोला, सरकार से नहीं लेते हो तनख्वाह?
वो बोले, उसमे आजतक किसका भला है हुआ?
भ्रष्टाचार तो हमारे देश की रीत है,
चुप चाप पैसे दे दो, इसी में तुम्हारी जीत है,
मैं बोला, इसी विचारधारा ने हमारे देश को तोड़ दिया है,
फिर से इसे अपंग बना कर छोड़ दिया है,
अरे इससे अच्छा तो तब था जब हम नहीं थे आज़ाद,
उस समय देश कहाँ था इतना बर्बाद?
अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, जाग जाइये,
इस देश को ईमानदारी से आगे बढाइये,
इसी से सारे काम हो जायेंगे बढ़िया,
और हमारा देश फिर से कहला सकेगा, "सोने की चिड़िया"

Amazing poem azzu.... such an important thing told in such a subtle and jovial way... humour is ur forte azzu... it takes a lot to make ppl laugh... and believe me.. i say again n again... to write humour is not easy... keep it up azzu... looking forward for more
ReplyDeleteThanks a Lot Jazuuuuuuu. :)
Delete