Monday, 30 July 2012

"जहां ना पहुंचे रवि, वहाँ पहुचे कवि"















जा रहा था वो कवि अपनी ही धुन में,
अपनी कविताओं की उधेड़ बुन में,
ना रहा था होश कहाँ उसके पाँव हैं,
मजधार में पहुच चुकी उस की नाव हैं,


तभी उसका पैर पड़ा खुले गटर पर,
जा पहुंचा वो कवि उसके तल में,
स्याह अँधेरे ने था उसको घेर लिया,
वहां से निकलना था ना उसके बल में,



अब उसने सोचा की कहाँ मैं हूँ फँस गया,
अपनी कल्पनाओ में ऐसा क्या था धस गया,
ना रहा था होश उसे, कहाँ था वो जा रहा,
अब वहां पड़ा पड़ा, था वोह कराह रहा,



तभी उसने देखा की सूरज की रोशनी,
वहां नहीं पहुँच पा रही थी कहीं भी,
उसे देखकर फिर वो हैं ये सोचता,
ऐ कवि तू वहां आ पहुंचा जहाँ रवि न पहुंचता!!

6 comments:

  1. Great Writing. Aakhir Meri Sangat Ka asar hua and TU itna Talented ho gaya :')

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  2. Haha! Jee Shukriya Rubz Ji! Sab Aap Hi Ki Kripaa Hai! ;P

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  3. Bhai sahi hai.. Last sentence ne toh dil hi jeet liya...

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  4. Kaafi vadia hai.... Isi baat par arz kia hai.. Azzu to kavi ban gaya hai Faraz.. Ab tumlog apna boriya bistar bandho :p

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