Saturday, 4 August 2012

बनना हैं कवि, तो चोरी नहीं














एक कवि ने लिखी कविता, सारा ध्यान लगाकर,
पात्र बनाये, दृश्य सजाये, शब्दों की छलके गागर,
कह कविता वो कवि हर्षाये, इठलाये,
देख कविता अपनी को मन ही मन मुस्काए,


फिर आता है एक सरफिरा बनना चाहे कवि,
शब्दों का भी ज्ञान नहीं था जिसको सही सही,
उस कवि की देख कविता वो मूरख हर्षाया,
सोचे की ये विचार क्यों मेरे मन ना आया,


फिर वो चुरा ले गया उस कविता को कह कर के अपना,
देखे फिर कवि बनने का वो सुहाना सपना,
पर उस मूरख की ये समझ ना आया,
कविता कहना एक कला हैं, ये उसको भेद ना पाया,


फिर आनंद ले वो प्रशंसा का, जो उसकी नहीं थी असल में,
जैसे कोई कीट लग जाए, किसी किसान की फसल में,
फिर एक मित्र उसकी खोले उसकी आँखें,
चोरी पकड़ी जाने पर फिर वो बगले झांके,


फिर आया उसको समझ, चोरी नहीं है सही,
विचार हो तो अपने हो, दुझो के नहीं,
तो अब उस मूरख ने हैं ये बात ठानी,
शब्द बुनेगा हमेशा अपने, अपनी ही कहानी!!

6 comments:

  1. Awesome!!! Loved it :)

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  2. superb azzzuuu :) keep up ur poetry.... u r too good with humor... humor is not at all easy... i've attempted but never able to write it...

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  3. THANKS Jazuu for the appreciation. :)

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  4. बहुत सुंदर! :)

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    1. शुक्रिया तृप्ति जी ;)

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